ऑस्ट्रेलिया ने नाउरू के साथ 267 मिलियन डॉलर, यानी लगभग ₹2,216 करोड़ की डिपोर्टेशन डील की है. इस समझौते के अंतर्गत, ऑस्ट्रेलिया गैर-वीजा धारकों को नाउरू भेजेगा. नाउरू को प्रवासियों के पहले समूह के पहुंचने पर ₹2,216 करोड़ मिलेंगे, और उसके बाद पुनर्वास के लिए हर साल ₹381 करोड़ दिए जाएंगे.
इस निर्णय के कारण ऑस्ट्रेलिया में मानवाधिकारों को लेकर विरोध प्रदर्शन शुरू हो गया है. मानवाधिकार संगठनों का कहना है कि इस समझौते से बड़े पैमाने पर निर्वासन और अंतरराष्ट्रीय कानूनों का उल्लंघन हो सकता है.
नाउरू, दक्षिण प्रशांत महासागर में स्थित एक द्वीप देश है, जिसका क्षेत्रफल मात्र 21 वर्ग किलोमीटर है. यह दुनिया का तीसरा सबसे छोटा देश है, जो वेटिकन सिटी और मोनाको से बड़ा है. ग्रीन पार्टी के सीनेटर डेविड शूब्रिज ने कहा कि सरकार हमारे छोटे पड़ोसियों को 21वीं सदी की जेल कॉलोनियां बनाने के लिए मजबूर कर रही है.
ऑस्ट्रेलिया के गृह मंत्री टोनी बर्क ने कहा कि जिन लोगों के पास ऑस्ट्रेलिया में रहने का कानूनी अधिकार नहीं है, उनके नाउरू में लंबे समय तक रहने और उचित देखभाल की व्यवस्था की जा रही है. फरवरी में हुए एक समझौते के तहत, ऑस्ट्रेलिया तीन हिंसक अपराधियों को नाउरू वापस भेज सकेगा. बर्क ने यह भी कहा कि जिनके पास वैध वीजा नहीं है, उन्हें देश छोड़ देना चाहिए.
2023 में, ऑस्ट्रेलियाई उच्च न्यायालय के एक फैसले ने उन अप्रवासियों के लिए सरकार की अनिश्चितकालीन हिरासत नीति को पलट दिया, जिन्हें न तो वीजा मिल सकता था और न ही निर्वासित किया जा सकता था, क्योंकि उन्हें उनके देशों में वापस भेजे जाने पर उत्पीड़न या नुकसान का सामना करना पड़ सकता था.
असाइलम सीकर रिसोर्स सेंटर की डिप्टी सीईओ, जना फेवरो ने इस समझौते की आलोचना करते हुए कहा कि यह समझौता भेदभावपूर्ण, शर्मनाक और खतरनाक है. उन्होंने कहा कि ऐसे समय में जब देश ने एकजुटता और डर के खिलाफ मतदान किया और एंथनी अल्बनीज को प्रधानमंत्री चुना, अल्बनीज नेतृत्व दिखाने के बजाय प्रवासियों और शरणार्थियों पर हमला कर रहे हैं. कुछ लोगों को केवल उनके जन्मस्थान के आधार पर दंडित किया जाएगा.