केरल उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में कहा कि अदालतों को अश्लीलता से संबंधित मामलों में वीडियो साक्ष्य की जांच करनी चाहिए ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि सामग्री वास्तव में अश्लील है या नहीं। अदालत ने कहा कि अगर किसी व्यक्ति पर अश्लील वीडियो वितरित करने का आरोप लगाया गया है तो ट्रायल कोर्ट के जज को खुद वीडियो की जांच करनी चाहिए।
अदालत ने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने वीडियो की सामग्री को देखे बिना ही एक व्यक्ति को दोषी ठहराया था, जिस पर अश्लील वीडियो कैसेट किराए पर देने का आरोप था। अदालत ने कहा कि निचली अदालत ने यह जांच नहीं की थी कि वीडियो में अश्लील सामग्री है या नहीं।
उच्च न्यायालय ने कहा कि यदि किसी वीडियो में अश्लील दृश्य हैं और उसे आईपीसी की धारा 292 के तहत अभियोजन में पेश किया जाता है, तो अदालत को यह जांच करनी चाहिए कि क्या यह कामुकता को बढ़ावा देता है।
यह मामला हरिकुमार से संबंधित था, जो कोट्टायम में एक वीडियो की दुकान चलाते थे। हरिकुमार पर 10 अश्लील वीडियो कैसेट रखने का आरोप लगाया गया था। ट्रायल कोर्ट ने उन्हें दोषी ठहराया और दो साल की सजा सुनाई, साथ ही 2,000 रुपये का जुर्माना लगाया। बाद में सजा को घटाकर एक साल कर दिया गया।
हरिकुमार ने उच्च न्यायालय में अपील की, जिसमें कहा गया कि मजिस्ट्रेट ने वीडियो की सामग्री की जांच नहीं की थी। उच्च न्यायालय ने फैसला सुनाया कि वीडियो साक्ष्य को प्राथमिक साक्ष्य माना जाना चाहिए और अदालतों को इसकी जांच करनी चाहिए। अदालत ने हरिकुमार की सजा को रद्द कर दिया।