Editorial :- ISRO ke purv vaigyaanik kastirirangan ne batai keral me badh ki asli vajh

प्रख्यात वैज्ञानिक के. कस्तूरीरंगन ने कहा है कि बढ़ती आबादी, पश्चिमी घाट के क्षरण और जलवायु परिवर्तन केरल में आई विनाशकारी बाढ़ के कारण हो सकते हैं। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के पूर्व अध्यक्ष ने इस बात का जिक्र किया है कि पिछली सदी में राज्य की आबादी बढ़ी है और पर्यावरण एवं संसाधनों पर इसका दबाव पड़ा है।

उन्होंने न्यूज एजेंसी पीटीआई से कहा, ‘इसलिए, इन सबका पर्यावरण पर असर पड़ा है …आबादी बढ़ी है, संसांधनों की मांग बढ़ी है, जिनमें भूमि, कृषि और कई अन्य गतिविधियां शामिल हैं।Ó योजना आयोग (अब भंग किए जा चुके) के सदस्य रह चुके कस्तूरीरंगन ने कहा कि अतीत में भारी बारिश का प्रकृति ने अपनी घनी वनस्पति और अन्य प्रकार के प्राकृतिक संसाधनों से प्रबंधन किया था। लेकिन 1940 के दशक की तुलना में पश्चजल सिमट कर 50 से 60 फीसदी रह गया है।

केरल से ही आने वाले कस्तूरीरंगन ने कहा कि पश्चिमी घाट का कई स्थानों पर क्षरण हुआ है और वहां कृषि गतिविधियां शुरू की गई हैं। आबादी के दबाव की वजह से ऐसा करना पड़ा है। कस्तूरीरंगन के मुताबिक भारी बारिश की वजह जलवायु परिवर्तन भी हो सकता है। उन्होंने कहा, ‘कई कारण हैं। इसका विश्लेषण करना होगा।Ó

उन्होंने भारी बारिश से हो रहे नुकसान को कम करने के लिए उपयुक्त योजना की अपील की। कस्तूरीरंगन ने कहा कि केरलवासियों की सतत आजीविका सुनिश्चित करने के लिए कदम उठाए जाने चाहिए। दरअसल, राज्य में 8 अगस्त से बारिश और बाढ़ से जुड़ी घटनाओं में 210 लोगों की जान जा चुकी है और 7. 14 लाख से ज्यादा लोग बेघर हो गए हैं।

केरल को दशकों बाद इतनी खतरनाक बाढ़ का सामना करना पड़ रहा है. पश्चिमी घाटों के संरक्षण पर एक ऐतिहासिक रिपोर्ट का कहना है कि अगर राज्य सरकार और स्थानीय अधिकारियों ने पर्यावरण कानूनों का पालन किया होता तो आपदा का स्तर छोटा हो सकता था. 2010 में पर्यावरण और वन मंत्रालय द्वारा गठित पश्चिमी घाट पारिस्थितिकी विशेषज्ञ पैनल की अध्यक्षता में वैज्ञानिक माधव गाडगील ने कहा कि केरल में समस्या का एक हिस्सा मानव निर्मित था.

डॉ. गाडगील ने इंडियन एक्सप्रेस से कहा कि “भारी वर्षा के कारण यह हुआ लेकिन राज्य में पिछले कई सालों के विकास ने इस तरह की घटनाओं से निपटने की अपनी क्षमता से समझौता किया है और आज हम जो पीड़ा देख रहे हैं ,यह उसी का परिणाम है. 2011 में प्रस्तुत अपनी विस्तृत रिपोर्ट में गाडगील पैनल ने पारिस्थितिक रूप से नाजुक पश्चिमी घाट क्षेत्र के प्राकृतिक पर्यावरण के संरक्षण के उपायों का सुझाव दिया था.

रिपोर्ट में सिफारिश की गई थी कि केरल समेत छह राज्यों में फैले पूरे पश्चिमी घाटों को पारिस्थितिकीय रूप से संवेदनशील घोषित किया जाएगा और घाटों के क्षेत्रों में पारिस्थितिक संवेदनशीलता के तीन स्तरों को आवंटित किया था.

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